नई दिल्ली, 26 मई 2026 (PIB)
CSIR-NIScPR और National Institute of Advanced Studies के बीच हुआ यह समझौता सिर्फ एक सामान्य MoU नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे Science Communication और Policy Research के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।
यह सहयोग ऐसे समय में हुआ है जब विज्ञान से जुड़ी जानकारी को आम लोगों तक सरल और भरोसेमंद तरीके से पहुँचाने की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। डिजिटल युग में गलत सूचनाओं (misinformation) की चुनौती के बीच इस तरह की पहल को काफी अहम माना जा रहा है।
समझौते में क्या खास है?
इस MoU का मुख्य उद्देश्य Science Communication, Public Engagement और Science & Technology (S&T) Policy Research को मजबूत करना है। इसके तहत दोनों संस्थान मिलकर Joint Research Projects, Faculty Exchange, Researcher Exchange, Joint Training Programs और Capacity Building Initiatives को आगे बढ़ाएंगे।
इसके अलावा विज्ञान से जुड़े कंटेंट को अधिक प्रभावी, सरल और जन-उपयोगी बनाने के लिए नई रणनीतियों पर भी काम किया जाएगा।
Science Communication का मॉडल क्यों जरूरी है?
NIAS के Director डॉ. शैलेश नायक ने कहा कि संस्थागत सहयोग के बिना Science Communication को मजबूत करना आसान नहीं है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अलग-अलग संस्थानों के अनुभव और संसाधनों को जोड़कर ही बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
वहीं CSIR-NIScPR की Director डॉ. गीता वाणी रायसम ने बताया कि अब समय आ गया है जब विज्ञान को आम लोगों तक सरल भाषा में पहुँचाने के लिए आधुनिक तकनीक और Artificial Intelligence (AI) का उपयोग जरूरी हो गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय भाषाओं में AI का ethical उपयोग बहुत महत्वपूर्ण है, ताकि विज्ञान से जुड़ी जानकारी अधिक पारदर्शी, भरोसेमंद और प्रभावी तरीके से लोगों तक पहुँच सके।
मॉडल की चुनौतियाँ
समारोह के बाद आयोजित विचार-मंथन सत्र में कई विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और Digital Age में Science Communication से जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।
इस दौरान misinformation, fake news, science literacy की कमी और public trust जैसे मुद्दों को प्रमुख चिंता के रूप में सामने रखा गया। विशेषज्ञों ने कहा कि अगर इन समस्याओं को समय रहते हल नहीं किया गया तो विज्ञान और आम जनता के बीच दूरी बढ़ सकती है।
क्या इस MoU से शिक्षा और शोध क्षेत्र में बदलाव आएगा?
चर्चा के दौरान यह भी सुझाव सामने आया कि Science Communication को केवल शोध तक सीमित न रखकर स्कूल शिक्षा, कॉलेज स्तर और सार्वजनिक नीति तक जोड़ना जरूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नागरिक विज्ञान (Citizen Science) को बढ़ावा देकर आम लोगों को भी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से जोड़ा जा सकता है। इससे विज्ञान के प्रति विश्वास और समझ दोनों बढ़ सकते हैं।
भविष्य की दिशा क्या हो सकती है?
इस समझौते को लेकर यह उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में यह साझेदारी Science Communication को अधिक समावेशी, तकनीकी और जन-केंद्रित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
AI आधारित टूल्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्थानीय भाषाओं में कंटेंट निर्माण के जरिए विज्ञान को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाने की दिशा में यह एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
Discussion about this post