नई दिल्ली
भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर हाल ही में जारी हुए राष्ट्रीय आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार सर्वेक्षण से पहले के 15 दिनों में बीमारी की शिकायत करने वालों की संख्या महिलाओं में अधिक रही। प्रति एक लाख आबादी पर पुरुषों में 13,504 बीमारी के मामले दर्ज किए गए, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 17,006 रहा। रिपोर्ट के मुताबिक हड्डियों और मांसपेशियों से जुड़ी समस्याएं, उच्च रक्तचाप, थायरॉयड संबंधी विकार तथा विभिन्न प्रकार के संक्रमण महिलाओं में अधिक पाए गए, साथ ही हृदय रोगों से जुड़े मामलों में भी महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक दर्ज की गई।
मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, फिर भी चुनौतियां बरकरार
हाल ही में जारी National Family Health Survey (NFHS)-6 के निष्कर्षों के अनुसार 95.9% गर्भवती महिलाओं को प्रसवपूर्व देखभाल (ANC) प्राप्त हुई, जबकि गर्भावस्था की प्रथम तिमाही में ANC प्राप्त करने वाली माताओं का अनुपात 70.0% से बढ़कर 76.2% हो गया। इसके अलावा संस्थागत प्रसव के आंकड़े भी बेहतर हुए हैं, जो सार्वभौमिक कवरेज के लक्ष्य की दिशा में सकारात्मक संकेत है। हालांकि, एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि आधुनिक गर्भनिरोधक उपायों का उपयोग 56.4% से घटकर 52.7% हो गया है, जबकि लोग अब पारंपरिक गर्भनिरोधक उपायों पर अधिक भरोसा करने लगे हैं।
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NFHS-6 के आंकड़े महिलाओं में बढ़ते मोटापे की पुष्टि भी करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार मोटापे की शिकार महिलाओं की हिस्सेदारी 24% से बढ़कर 30.7% हो गई है, जबकि पुरुषों में यह 22.9% से बढ़कर 27.3% हुई। इसके साथ ही देश में महिलाओं में Anemia यानी खून की कमी की समस्या भी व्यापक बनी हुई है, जिसके लक्षणों में कमजोरी, चक्कर आना और थकान शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित आहार और आयरन की पर्याप्त मात्रा से इससे बचाव संभव है।
मानसिक स्वास्थ्य में महिलाएं ज्यादा प्रभावित
मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी तस्वीर असमान है। NIMHANS के एक अध्ययन के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य विकार पुरुषों (10 प्रतिशत) की तुलना में महिलाओं (20 प्रतिशत) में अधिक प्रचलित हैं, और भारत में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अवसाद, चिंता और दैहिक शिकायतों का अधिक खतरा पाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट में भी कहा गया है कि महिलाएं अतीत की तुलना में अधिक लंबा जीवन जी रही हैं, लेकिन यह जीवन स्वास्थ्य कसौटी पर अब भी बेहतर नहीं है, क्योंकि गलत निदान और चिकित्सा पूर्वाग्रह जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।
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शिक्षा और बीमा कवरेज में सुधार से उम्मीद
सकारात्मक पक्ष यह है कि 15 से 49 साल की महिलाओं में दस या इससे अधिक वर्षों की स्कूली शिक्षा का प्रतिशत 2005-06 के 22.3% से लगभग दोगुना बढ़कर 2023-24 में 46.4% हो गया है, और परिवारों में स्वास्थ्य बीमा कवरेज भी 4.8% से बढ़कर 60.2% हो चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षा और आर्थिक समावेशन में सुधार आगे चलकर महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर डाल सकता है।
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आर. पी. अरोड़ा
सीनियर जर्नलिस्ट
तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय आर. पी. अरोड़ा राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और समसामयिक विषयों के अनुभवी विश्लेषक हैं। खोजी रिपोर्टिंग और जमीनी मुद्दों पर उनकी पैनी नजर उन्हें एक विश्वसनीय पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।
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