नई दिल्ली, 18 जुलाई 2026
चार वर्षीय कथित दुष्कर्म पीड़िता को समय पर इलाज नहीं मिलने के मामले में Supreme Court ने दो Private Hospitals और एक Ayurveda Practitioner के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि आपातकालीन स्थिति में किसी भी मरीज को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना डॉक्टरों और अस्पतालों की पहली जिम्मेदारी है। कोर्ट ने उपचार में कथित लापरवाही को गंभीर मानते हुए पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा दिए जाने के पहलू पर भी विचार करने की बात कही।
Ayurveda Practitioner पर Court की तीखी टिप्पणी
Medical Dialogues की रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान बच्ची के पिता की ओर से कहा गया कि घटना के बाद बच्ची करीब दो घंटे तक जीवित थी और यदि उसे समय पर उपचार मिल जाता तो उसकी जान बच सकती थी। इस पर सुनवाई कर रही बेंच ने संबंधित Ayurveda Practitioner के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी मरीज को तत्काल इलाज नहीं दे सकते थे, तो कम से कम उसे स्वयं दूसरे अस्पताल पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए थी।
“A child is brought before you, and you are so merciless, you did not provide medical care. If you had any empathy, you would have taken her to the hospital yourself.”
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Doctors को भी Court ने लगाई फटकार
सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित अस्पतालों के डॉक्टरों की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी अस्पताल में आवश्यक सुविधा उपलब्ध नहीं है, तब भी मरीज को बिना उपचार के छोड़ना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में डॉक्टर का दायित्व है कि वह मरीज को तुरंत ऐसे अस्पताल भेजे जहां इलाज संभव हो। अदालत ने यह भी कहा कि मरीज की आर्थिक स्थिति के आधार पर चिकित्सा सेवा से इनकार करना स्वीकार्य नहीं है।
“You have no business of writing ‘doctor’ with your name if you don’t perform your duty. If you had sensitivity, you would have gone with the child to another hospital if you didn’t have the facility. You ignored her because she was poor. Couldn’t afford your fee.”
मुआवजे पर Court ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान Law Beat की रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि वह संबंधित डॉक्टर और अस्पतालों पर मुआवजा लगाने के विकल्प पर विचार कर रही है। कोर्ट ने अस्पतालों से पीड़ित परिवार को स्वेच्छा से आर्थिक सहायता देने के लिए भी कहा और स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं करने पर अतिरिक्त लागत (Costs) लगाई जा सकती है।
“When we impose penalty, it will have a chilling effect. It will be victim compensation and a reasonable compensation to the family. You have acted in the most ruthless manner.”
कोर्ट की इस टिप्पणी को उपचार में कथित लापरवाही और अस्पतालों की जवाबदेही पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में दंड का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार को न्याय और उचित मुआवजा दिलाना भी होना चाहिए।
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मामले की जांच जारी, पहले SIT का भी हुआ था गठन
यह मामला उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में चार वर्षीय बच्ची के कथित दुष्कर्म और हत्या से जुड़ा है। इससे पहले Supreme Court ने मामले की दोबारा जांच के लिए Special Investigation Team (SIT) गठित करने का निर्देश दिया था। अब अदालत इलाज में कथित लापरवाही, अस्पतालों और संबंधित चिकित्सक की भूमिका की भी समीक्षा कर रही है। मामले की सुनवाई जारी है और सभी पक्षों की दलीलों व उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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दीपक अरोड़ा
पत्रकार (BAJMC ,LLB )
सोशल मीडिया एवं डिजिटल पत्रकारिता में 6 वर्षों से सक्रिय हैं, स्वास्थ्य, राजनीति, अपराध और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग एवं विश्लेषणात्मक लेखन का अनुभव रखते हैं। पिछले तीन वर्षों से मेडिकल रिपोर्टर से जुड़े हैं।
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