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Home खबरें

Rajasthan HC का बड़ा फैसला: NPA ठुकराने वाले डॉक्टर जूनियर्स के बराबर वेतन नहीं मांग सकते

Medical Reporter by Medical Reporter
June 8, 2026
in खबरें, राजस्थान
Rajasthan HC
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जयपुर, 6 जून 2026

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जिन सरकारी डॉक्टरों ने स्वेच्छा से Non-Practicing Allowance (NPA) लेने से इनकार किया था, वे बाद में उन जूनियर डॉक्टरों के बराबर वेतन की मांग नहीं कर सकते जिन्होंने NPA का विकल्प चुना था। अदालत ने कहा कि NPA न लेने और निजी प्रैक्टिस जारी रखने का निर्णय डॉक्टरों का स्वयं का विकल्प था, इसलिए उससे उत्पन्न वेतन अंतर को वेतन विसंगति (Pay Anomaly) नहीं माना जा सकता।

राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ के न्यायमूर्ति आनंद शर्मा ने यह फैसला सुनाते हुए राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय न्यायाधिकरण (Tribunal) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार को वरिष्ठ डॉक्टरों का वेतन बढ़ाकर उन्हें उनके जूनियर डॉक्टरों के बराबर करने का निर्देश दिया गया था।

NPA को लेकर कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

मामला राजस्थान सिविल सेवा (संशोधित वेतनमान) नियम, 2017 और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद शुरू हुआ। नियमों के अनुसार, जिन डॉक्टरों ने NPA का विकल्प चुना था, उनके वेतन निर्धारण में NPA पर मिलने वाले Dearness Allowance (DA) को भी शामिल किया गया। दूसरी ओर, जिन डॉक्टरों ने NPA नहीं लिया, उनके वेतन का निर्धारण सामान्य नियमों के तहत किया गया।

इस प्रक्रिया के बाद कुछ ऐसे मामले सामने आए जहां NPA लेने वाले जूनियर डॉक्टरों का वेतन उनके वरिष्ठ अधिकारियों से अधिक हो गया। वरिष्ठ डॉक्टरों ने इसे वेतन असमानता बताते हुए दावा किया कि NPA केवल एक भत्ता (Allowance) है और इसे मूल वेतन निर्धारण का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसी आधार पर उन्होंने या तो NPA का काल्पनिक लाभ (Notional Benefit) देने या उनका वेतन जूनियर्स के बराबर करने की मांग की थी।

हाई कोर्ट ने क्यों माना दोनों वर्ग अलग-अलग?

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि NPA प्राप्त करना स्वतःस्फूर्त अधिकार नहीं है, बल्कि इसके लिए डॉक्टरों को निर्धारित समय में विकल्प चुनना और निजी प्रैक्टिस न करने का शपथपत्र देना आवश्यक होता है। अदालत के अनुसार, NPA लेने वाला डॉक्टर निजी प्रैक्टिस का अधिकार छोड़ता है, जबकि NPA नहीं लेने वाला डॉक्टर निजी प्रैक्टिस से अतिरिक्त आय अर्जित कर सकता है।

हाई कोर्ट ने कहा कि दोनों श्रेणियों के डॉक्टर समान स्थिति में नहीं हैं। एक वर्ग ने निजी प्रैक्टिस छोड़कर NPA स्वीकार किया, जबकि दूसरे वर्ग ने निजी प्रैक्टिस जारी रखने का निर्णय लिया। इसलिए दोनों की वेतन संरचना और लाभों की तुलना करना उचित नहीं है। अदालत ने माना कि नियमों में दोनों श्रेणियों के लिए अलग-अलग वेतन निर्धारण प्रणाली पहले से निर्धारित है और यह विभाजन तार्किक एवं वैध है।

ट्रिब्यूनल की व्याख्या को अदालत ने बताया गलत

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ट्रिब्यूनल ने नियमों की भाषा और उद्देश्य की गलत व्याख्या की थी। अदालत के अनुसार, संशोधित वेतन नियमों में स्पष्ट रूप से NPA प्राप्त करने वाले डॉक्टरों के लिए विशेष वेतन निर्धारण फार्मूला निर्धारित किया गया था। ऐसे में केवल समानता के आधार पर वेतन बढ़ाने का निर्देश देना कानूनी रूप से उचित नहीं था।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल वरिष्ठता के आधार पर समान वेतन का दावा नहीं किया जा सकता। यदि किसी कर्मचारी को अतिरिक्त भत्ते, विशेष प्रोत्साहन या वैधानिक नियमों के तहत लाभ मिल रहा है, तो उससे उत्पन्न वेतन अंतर को भेदभाव नहीं माना जाएगा। इसी आधार पर अदालत ने ट्रिब्यूनल का आदेश निरस्त कर दिया और राज्य सरकार की याचिका स्वीकार कर ली।

फैसले का डॉक्टरों पर क्या असर पड़ेगा?

इस निर्णय के बाद राजस्थान में उन सरकारी डॉक्टरों की मांगों को बड़ा झटका लगा है जो NPA न लेने के बावजूद NPA प्राप्त करने वाले जूनियर डॉक्टरों के बराबर वेतन चाहते थे। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि NPA लेने या न लेने का विकल्प स्वयं डॉक्टरों द्वारा चुना गया निर्णय है और उसके वित्तीय परिणामों को बाद में चुनौती नहीं दी जा सकती। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में सरकारी सेवाओं में विकल्प आधारित भत्तों और वेतन निर्धारण से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

यह भी पढ़े: AIIMS Admission में अड़चन बनी एक फाइल, Delhi HC के फैसले ने बदल दी डॉक्टर की किस्मत…

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