पटना, 31 जुलाई 2026
Patna High Court ने Medical Negligence से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि Gross Negligence के ठोस सबूत और किसी सक्षम Expert Medical Opinion के अभाव में किसी डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने करीब 14 साल पुराने एक आपराधिक मामले में एक Orthopaedic Surgeon को राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल उपचार के दौरान जटिलता उत्पन्न होने या मरीज की मृत्यु हो जाने मात्र से डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में पहले यह साबित होना जरूरी है कि डॉक्टर की लापरवाही सामान्य नहीं बल्कि Gross Negligence की श्रेणी में आती है।
क्या था पूरा मामला?
मामला वर्ष 2012 का है, जब एक व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि उसके पिता के हाथ में फ्रैक्चर होने के बाद पटना स्थित एक निजी Nursing Home में भर्ती कराया गया। शिकायत के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान मरीज की तबीयत बिगड़ गई और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। शिकायतकर्ता ने इलाज में लापरवाही और अधिक पैसे वसूलने के आरोप भी लगाए थे। दूसरी ओर, डॉक्टर का कहना था कि ऑपरेशन से पहले सभी आवश्यक जांच कराई गई थीं और मरीज की स्थिति बिगड़ने पर सर्जरी आगे नहीं बढ़ाई गई। ट्रायल कोर्ट ने डॉक्टर को राहत देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने Patna High Court का रुख किया।
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Expert Opinion को बताया अनिवार्य
Justice Chandra Shekhar Jha की पीठ ने कहा कि मेडिकल प्रोफेशनल के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई तभी उचित मानी जा सकती है, जब शिकायत के समर्थन में किसी सक्षम और स्वतंत्र डॉक्टर की विश्वसनीय राय उपलब्ध हो। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विशेषज्ञ चिकित्सा मत मौजूद नहीं था, जो यह साबित कर सके कि संबंधित डॉक्टर ने मरीज की सुरक्षा की पूर्ण अनदेखी करते हुए गंभीर लापरवाही की थी। कोर्ट ने Supreme Court के पूर्व फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई से पहले स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञ की राय आवश्यक है। अदालत ने कहा कि बिना ऐसे साक्ष्यों के मुकदमा जारी रखना न्याय के उद्देश्य के विपरीत होगा और इससे चिकित्सा पेशे में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
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Doctors और मरीजों के अधिकारों पर क्या बोला कोर्ट?
High Court ने अपने फैसले में कहा कि Article 21 केवल मरीजों के जीवन के अधिकार की ही नहीं, बल्कि डॉक्टरों के सम्मानपूर्वक और निष्पक्ष वातावरण में अपना पेशा करने के अधिकार की भी रक्षा करता है। अदालत ने कहा कि चिकित्सकों को बिना पर्याप्त सबूत के आपराधिक मुकदमों में घसीटना न्यायसंगत नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में वास्तव में Gross Negligence के पर्याप्त प्रमाण और विशेषज्ञ की राय उपलब्ध हो, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। कोर्ट ने अंततः ट्रायल कोर्ट के वर्ष 2017 के आदेश को रद्द करते हुए डॉक्टर के खिलाफ लंबित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया। यह फैसला मेडिकल नेग्लिजेंस से जुड़े मामलों में Expert Opinion की आवश्यकता को एक बार फिर मजबूत करता है।
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दीपक अरोड़ा
पत्रकार (BAJMC ,LLB )
सोशल मीडिया एवं डिजिटल पत्रकारिता में 6 वर्षों से सक्रिय हैं, स्वास्थ्य, राजनीति, अपराध और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग एवं विश्लेषणात्मक लेखन का अनुभव रखते हैं। पिछले तीन वर्षों से मेडिकल रिपोर्टर से जुड़े हैं।
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