रायबरेली, 8 मई।
राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर), रायबरेली ने अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हैदराबाद स्थित लॉफ्टी लेबोरेटरीज के साथ महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इस साझेदारी के तहत दोनों संस्थानों के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू), गोपनीयता गैर-प्रकटीकरण समझौता (सीडीए) और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते किए गए हैं।
सरकार के अनुसार, यह पहल औषधि और जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान के क्षेत्र में अकादमिक संस्थानों और उद्योग जगत के बीच सहयोग को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है। इस साझेदारी का उद्देश्य नाईपर रायबरेली में विकसित स्वदेशी तकनीकों को उद्योग स्तर पर व्यावसायिक रूप से उपयोग में लाना और अनुसंधान को नई दिशा देना है।
समझौते के तहत दोनों संस्थान अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों में संयुक्त रूप से भाग लेंगे और पारस्परिक हित वाले क्षेत्रों में नई तकनीकों और नवाचारों पर काम करेंगे। इसके साथ ही, नाईपर रायबरेली में विकसित उद्योग-अनुकूल तकनीकों को व्यावसायिक उपयोग के लिए अपनाने पर भी सहमति बनी है।
नाईपर रायबरेली की निदेशक प्रोफेसर शुभिनी ए. सराफ ने कहा कि यह समझौता दोनों संस्थानों के अनुसंधान कार्यक्रमों को एक-दूसरे के लिए पूरक बनाने में मदद करेगा। उन्होंने बताया कि इस सहयोग के तहत संस्थान के “नवीन औषधि वितरण प्रणाली उत्कृष्टता केंद्र” यानी सीओई-एनडीडीएस की गतिविधियों में भी संयुक्त भागीदारी की जाएगी।
उन्होंने कहा कि नवीन औषधि वितरण प्रणाली का उद्देश्य दवाओं को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से शरीर के आवश्यक हिस्सों तक पहुंचाना है, ताकि बेहतर चिकित्सीय परिणाम प्राप्त किए जा सकें। इस क्षेत्र में विकसित तकनीकें भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं और औषधि उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।
प्रो. सराफ ने उत्कृष्टता केंद्र में विकसित तकनीकों के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्थान की कई और तकनीकें भी वर्ष के अंत तक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए तैयार हो सकती हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस तरह की साझेदारियां भारत में स्वदेशी अनुसंधान और नवाचार को नई गति देंगी।
वहीं, नवीन औषधि वितरण प्रणाली उत्कृष्टता केंद्र के प्रमुख प्रोफेसर निहार रंजन ने बताया कि वर्तमान तकनीक के व्यावसायीकरण से जेल-स्टेनिंग एजेंट की लागत में काफी कमी आएगी। ये एजेंट जीव विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाते हैं, विशेष रूप से जीन, कैंसर और न्यूक्लिक एसिड से जुड़ी बीमारियों के अध्ययन में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उन्होंने कहा कि यदि ऐसे जेल-स्टेनिंग एजेंट का स्वदेशी स्तर पर उत्पादन शुरू होता है, तो इससे भारत के औषधि और जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र को मजबूती मिलेगी और आयात पर निर्भरता भी कम होगी। साथ ही, शोध कार्यों की लागत घटने से देश में वैज्ञानिक अनुसंधान को भी बढ़ावा मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की अकादमिक-उद्योग साझेदारियां भारत को जैव प्रौद्योगिकी और फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। सरकार भी लगातार स्वदेशी तकनीकों के विकास और उनके व्यावसायीकरण को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है।
नाईपर रायबरेली और लॉफ्टी लेबोरेटरीज के बीच हुआ यह समझौता आने वाले समय में स्वास्थ्य अनुसंधान, नई दवा तकनीकों और जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारत की क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
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