दवा के पर्चे से लेकर उसके इस्तेमाल के बाद होने वाली परेशानी तक, मरीज की सुरक्षा की जिम्मेदारी कहां खत्म होती है? 21 सितंबर को घोषित नई पहल का संदेश है: निगरानी दवा मिलने पर खत्म नहीं होती। स्वास्थ्य मंत्रालय ने दवाओं के सुरक्षित उपयोग की नई राष्ट्रीय मार्गदर्शिका, प्रतिकूल प्रभावों की डिजिटल रिपोर्टिंग और प्रत्यारोपण से जुड़ी सुरक्षा निगरानी पर जानकारी दी है।
आज क्या शुरू हुआ?
नई दिल्ली में छठे राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह के कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने नेशनल फ़ार्मुलेरी ऑफ इंडिया का सातवां संस्करण, एनएफआई 2026, जारी किया। यह स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए दवाओं के उचित उपयोग की संदर्भ-पुस्तिका है। इसे मरीज के लिए अपने आप उपचार चुनने वाली किताब समझना सही नहीं होगा।
साथ ही अस्पतालों के लिए चिकित्सा उपकरणों से संबंधित प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी का मार्गदर्शन दस्तावेज और iOS उपयोगकर्ताओं के लिए ADR-PvPI 2.0 ऐप जारी करने की जानकारी दी गई। मंत्रालय के अनुसार ऐप के माध्यम से दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्ट ऑनलाइन दर्ज की जा सकती है।
653 दवाओं की जानकारी: संख्या से आगे इसका महत्व
मंत्रालय के विवरण के अनुसार नए फ़ार्मुलेरी में 34 अध्याय, 20 परिशिष्ट और 653 दवाओं की जानकारी है। इसमें 42 निश्चित-खुराक संयोजनों और 30 प्रतिरक्षात्मक औषधियों का विवरण भी शामिल है। दवा-संबंधी विवरणों को राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची और राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अनुरूप संशोधित किया गया है।
स्वास्थ्यकर्मी के लिए इसका उपयोग दवा के चयन और इस्तेमाल पर प्रमाण-आधारित जानकारी तक पहुंच है। पाठक के लिए जरूरी फर्क यह है कि किसी दवा का संदर्भ-पुस्तिका में शामिल होना उसे हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं बनाता। व्यक्तिगत बीमारी, पहले से चल रहा उपचार और चिकित्सकीय आकलन की जगह कोई सामान्य सूची नहीं ले सकती।
मुद्रित पुस्तक के अलावा डिजिटल संस्करण भी उपलब्ध बताया गया है। इसमें स्वास्थ्य कार्यक्रमों, टीकाकरण अनुसूचियों और अनुपयोगी या समाप्त हो चुकी दवाओं के सुरक्षित निपटान से जुड़े आधिकारिक संसाधनों के लिंक हैं।
दवा, उपकरण और प्रत्यारोपण: तीन अलग निगरानी क्षेत्र
फार्माकोविजिलेंस दवाओं से जुड़ी प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं की जानकारी जुटाने और उसका आकलन करने का क्षेत्र है। मैटेरियोविजिलेंस में चिकित्सा उपकरणों से संबंधित घटनाओं की निगरानी आती है। दोनों को एक ही प्रकार की शिकायत समझने के बजाय संबंधित उत्पाद और घटना का स्पष्ट विवरण जरूरी है।
सरकार ने बायोविजिलेंस कार्यक्रम को मंजूरी देने की घोषणा भी की है। विज्ञप्ति के अनुसार भारतीय फार्माकोपिया आयोग अंग और ऊतक प्रत्यारोपण से संबंधित प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्टिंग, मूल्यांकन और निगरानी में अग्रणी भूमिका निभाएगा। यह सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने की पहल है, प्रत्यारोपण के जोखिम समाप्त हो जाने का दावा नहीं।
लगभग 1,150 केंद्र हैं; विस्तार अभी योजना है
राज्य मंत्री के अनुसार सरकारी और निजी अस्पतालों तथा मेडिकल कॉलेजों में लगभग 1,150 प्रतिकूल दवा प्रतिक्रिया रिपोर्टिंग केंद्र संचालित हैं। इन सुविधाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा तक विस्तार देने की योजना बताई गई है। योजना की घोषणा का मतलब यह नहीं कि हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर यह सुविधा अभी उपलब्ध हो गई है।
रिपोर्टिंग में मरीजों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। लेकिन रिपोर्ट दर्ज करना और किसी दवा को किसी घटना का प्रमाणित कारण ठहराना अलग चरण हैं; नई व्यवस्था का उद्देश्य जानकारी का व्यवस्थित आकलन करना है।
पाठक अपने अगले परामर्श में क्या स्पष्ट करें?
अपने डॉक्टर या फार्मासिस्ट से पूछें कि संदिग्ध प्रतिकूल प्रभाव की सूचना किस आधिकारिक माध्यम से दी जा सकती है। यह भी समझें कि रिपोर्टिंग के लिए कौन-सी जानकारी चाहिए और आगे की चिकित्सकीय सलाह कहां मिलेगी। ऐप को उपचार या आपातकालीन सहायता का विकल्प न मानें।
इस घोषणा से दवा-सुरक्षा की दिशा और उपलब्ध उपकरण स्पष्ट होते हैं। वास्तविक असर समझने के लिए आगे केंद्रों तक पहुंच, रिपोर्टों के आकलन और उन पर हुई कार्रवाई को देखना होगा। केवल नई पुस्तक या ऐप जारी होने से परिणाम सिद्ध नहीं हो जाते।
स्रोत: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की PIB विज्ञप्ति, 21 सितंबर 2026।
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2313061
चित्र: राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह के कार्यक्रम की आधिकारिक तस्वीर। सौजन्य: PIB / स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय।

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