सरकारी नीतियां

दवा का विज्ञापन देखकर इलाज? पर्चे वाली दवाओं के प्रचार पर सरकार का नया प्रस्ताव समझिए

खबर का सार

खुदरा विक्रेताओं और थोक कारोबारियों तक विज्ञापन की पाबंदी बढ़ाने का प्रस्ताव आया है। मसौदे और लागू कानून का फर्क जानिए।

पर्चे, दवा की कैप्सूल और प्रचार संकेत के बीच चिकित्सकीय समीक्षा का प्रतीक — मौलिक सांकेतिक संपादकीय चित्र

पर्चे पर मिलने वाली दवा का प्रचार देखकर उसे खुद लेना सुरक्षित इलाज का रास्ता नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की 9 अक्टूबर की विज्ञप्ति के मुताबिक, सरकार ने ऐसी दवाओं के विज्ञापन संबंधी शर्तें बिक्री और वितरण के लाइसेंसधारकों तक बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। 10 अक्टूबर की इस रिपोर्ट में सबसे जरूरी बात है: यह अभी मसौदा है, अंतिम संशोधन नहीं।

किस अंतर को भरने की कोशिश है?

मौजूदा व्यवस्था में Schedule H, H1 और X की दवाओं के विज्ञापन के लिए निर्माताओं को केंद्र की पूर्व मंजूरी चाहिए। प्रस्ताव खुदरा, थोक और वितरण लाइसेंसधारकों को भी इस शर्त के दायरे में लाना चाहता है। इसके लिए Drugs Rules, 1945 के Rule 65 में नया उपनियम जोड़ने की बात है।

मंत्रालय ने 28 सितंबर की G.S.R. 861(E) अधिसूचना का उल्लेख किया है। आपत्तियां और सुझाव राजपत्र की प्रतियां सार्वजनिक उपलब्ध होने की तारीख से 30 दिन के भीतर मांगे गए हैं। इसलिए केवल अधिसूचना की तारीख देखकर अंतिम समयसीमा मान लेना ठीक नहीं होगा।

ग्राहक के लिए उपयोगी सवाल

किसी प्रचार में “लोकप्रिय”, “तेज असर” या “ऑफर” लिखा हो, तो उससे आपके लिए दवा की जरूरत तय नहीं होती। डॉक्टर या फार्मासिस्ट से पूछने लायक सवाल हैं: यह दवा किस समस्या के लिए है, क्या इसके लिए पर्चा चाहिए, और मेरी दूसरी दवाओं के साथ इसकी समीक्षा कौन करेगा?

आगे क्या देखना होगा?

संपादकीय दृष्टि से अगली महत्वपूर्ण जानकारी अंतिम नियम का पाठ और उसके लागू होने की तारीख होगी। मसौदा जारी होना और व्यवहार में निगरानी होना अलग चरण हैं। इस प्रस्ताव को सभी दवा विज्ञापनों पर तत्काल पूर्ण प्रतिबंध बताना गलत होगा। खबर पढ़कर अपनी निर्धारित दवा बंद या बदलने के बजाय उपचार संबंधी निर्णय चिकित्सक के साथ करें।

स्रोत और चित्र

https://www.pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=2321172

चित्र: Medical Reporter का मौलिक सांकेतिक संपादकीय चित्र; यह किसी मरीज, उपकरण या कार्यक्रम की वास्तविक तस्वीर नहीं है।